शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013



यह कविता मेरी बहन के द्वारा लिखी गई हे,

एक बेटी का मॉ के प्रति प्रेम


आखिर मॉ तो मॉ है............................


न्याय की मुर्ति है वह ,
जो लडकी हो या लडका देखती सबको बराबर है,
क्योकि आखिर मॉ तो मॉ है।
जब वह मेरे लम्बे सुनहरे बालो को प्यार से सहलाती,
तो मैं अपनी सारी चिन्ता और उलझन को भूल जाती,
जब वह दुलार करती हुई, मेरे बालो में चोटी बाधंती तो मैं भी चोटी के साथ मॉ के प्रेम में बन्ध जाती
जब वह प्यार से मुझे डांटती तो मैं हॅंस जाती और उसे भी हॅसाती
क्योकि आखिर मॉ तो मॉ है।
जब मैं बरसात मे भीगती हुई घर आती
तो पापा कहते थोडी देर रूक जाती, भैया कहते छाता लेकर जाती,
लेकिन मॉ कहती अरे यह बरसात ही थोडी देर रूक जाती,
क्योकि आखिर मॉ तो मॉ है।
जब मॉ कही एक-दो दिन के लिए बाहर जाती
तो घर की रौनक भी साथ-साथ कदम बढाती,
घर मे रह जाती बेटी और उदासी,
क्योकि आखिर मॉ तो मॉ है।

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