रविवार, 21 अप्रैल 2013

“खुशी” हमारे जीवन मे बहुत महत्व रखती हैं।




“खुशी” हमारे जीवन मे बहुत महत्व रखती हैं। “खुशी” मन की एक अवस्था है। “खुशी” हमे हर आनन्द, की अनूभूति का अहसास दिलाती है। 

थोडे समय के लिए कल्पना करके देखिये, कि अगर “खुशी” ना हो जीवन मे तो जीवन का क्या अर्थ हो ? 
शायद अगर जीवन मे “खुशी” ना हो तो एक पल तो जीवन बेकार हो जायेगा। हॉ बिल्कुल सही है। “खुशी” बिना सब व्यर्थ सा प्रतित होता है। लेकिन “खुशी” जी के एक छोटे भाई भी है जिनका नाम हे, ”गम“ हम इन्है भी अनदेखा नही कर सकते है। जितना महत्व खुशी का है उतना ही गम का भी। किसी के भी जीवन में हमेशा ना खुशी रह सकती है न गम, चाहे वह राजा हो या रंक। आप केवल मीठा-ही-मीठा खाते रहें तो ऊब जाएंगे, केवल खट्टा खाएंगे तो भी। इसलिए भोजन में हर प्रकार का स्वाद उसके प्रति हमारा लगाव बनाए रखता है और भोजन प्रिय बना रहता है। जीवन में खुशी और गम भी ऐसे ही हैं।

खुशी देने वाले की ताकत गम देने से कई गुना ज्यादा है क्योंकि खुशी को हर कोई याद रखना चाहता है और गम को हर कोई भुलाना।

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013



यह कविता मेरी बहन के द्वारा लिखी गई हे,

एक बेटी का मॉ के प्रति प्रेम


आखिर मॉ तो मॉ है............................


न्याय की मुर्ति है वह ,
जो लडकी हो या लडका देखती सबको बराबर है,
क्योकि आखिर मॉ तो मॉ है।
जब वह मेरे लम्बे सुनहरे बालो को प्यार से सहलाती,
तो मैं अपनी सारी चिन्ता और उलझन को भूल जाती,
जब वह दुलार करती हुई, मेरे बालो में चोटी बाधंती तो मैं भी चोटी के साथ मॉ के प्रेम में बन्ध जाती
जब वह प्यार से मुझे डांटती तो मैं हॅंस जाती और उसे भी हॅसाती
क्योकि आखिर मॉ तो मॉ है।
जब मैं बरसात मे भीगती हुई घर आती
तो पापा कहते थोडी देर रूक जाती, भैया कहते छाता लेकर जाती,
लेकिन मॉ कहती अरे यह बरसात ही थोडी देर रूक जाती,
क्योकि आखिर मॉ तो मॉ है।
जब मॉ कही एक-दो दिन के लिए बाहर जाती
तो घर की रौनक भी साथ-साथ कदम बढाती,
घर मे रह जाती बेटी और उदासी,
क्योकि आखिर मॉ तो मॉ है।
Wish You Very Very Happy "Diwali" 

शंकित मन की, नीरसता को, आई मिटाने, ’’दीपमालिका’’।
भटके राही, रोशन करने, आई घर-घर, ’’दीपमालिका’’।।

         अंधकार की छाती चीरे, ये, नन्हा सा दीपक प्यारा।
         संघर्षों की, सीखे देते, बीते उसका, जीवन सारा।।
         मानव को, नवजीवन देने, आई घर-घर, ’’दीपमालिका’’।।

विजयगान ये, विजय पताका, सत्य, और प्रशंसा का।
प्रणवीरों की, रही साक्षी, गीत बने, अभिसंशा का।।
कर्म प्रधान है।, यही बताने, आई घर-घर, ’’दीपमालिका’’।।

        दीप उजाला, भरे चेतना, हर के, मन की पीढा को।
        फुलझडियॉ और पटाखे, दर्शाते जीवन क्रीडा को।।
        कर्तव्य का, शंख फूॅकने, आई घर-घर, ’’दीपमालिका’’।।

अज्ञानी बन क्या सोने का, क्या ? मानस तुमने बना लिया ।
लक्ष्मण रेखा, लॉघ के कबसे ? शत्रु घर में, आ ही गया।।
मानव को आव्हान करने, आई घर-घर, ’’दीपमालिका’’।।
                     
         लाखो रुपये, अग्नि के संग, फट्ट फटाफट, जल जाते हैं।
         महापुरुषों की, पुण्य धरा पर, लाखों भूखे, सो, जाते है।।
         स्वार्थों की चकाचौंध में, सिमट गई हैं, ’’दीपमालिका’’।।